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गजेंद्र मोक्ष

संकट में भगवान को पुकारने वाले गजराज की कथा

एक विशाल वन में गजेंद्र नाम का बलशाली हाथियों का राजा रहता था। एक दिन वह अपनी हथिनियों के साथ एक सुंदर सरोवर में जल-क्रीड़ा करने उतरा। गजेंद्र अपने बल पर बहुत अभिमान करता था।

जल में एक शक्तिशाली मगरमच्छ (ग्राह) रहता था। उसने गजेंद्र का पैर अपने जबड़े में कसकर पकड़ लिया और गहरे जल की ओर खींचने लगा। गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति लगाई, पर जल में मगरमच्छ अधिक बलवान था। यह संघर्ष कोई एक-दो दिन नहीं, बरसों चलता रहा।

धीरे-धीरे गजेंद्र की सारी शक्ति क्षीण हो गई। उसका अभिमान टूट गया। जब उसने देख लिया कि उसका अपना बल अब किसी काम का नहीं, तब उसने अंतिम सहारे के रूप में सच्चे मन से भगवान विष्णु को पुकारा। उसने अपनी सूँड में एक कमल का फूल उठाकर आर्त स्वर में प्रार्थना की — 'हे प्रभु! जो इस सृष्टि के रचयिता हैं, जो सबके आधार हैं, मेरी रक्षा करें!'

गजेंद्र की यह निष्कपट, अहंकाररहित पुकार सुनते ही भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर तुरंत वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का अंत किया और गजेंद्र को बाहर खींच लिया।

कहते हैं वह मगरमच्छ पूर्व जन्म में एक शापित गंधर्व था, जो मुक्त हो गया। गजेंद्र मोक्ष की यह कथा सिखाती है कि जब तक मनुष्य को अपने बल का अहंकार रहता है, वह अकेला संघर्ष करता है; पर जब वह अहंकार त्यागकर सच्चे मन से भगवान की शरण में जाता है, तभी उसकी सच्ची रक्षा और मुक्ति होती है।

🌼 सीख

सच्चे मन से की गई पुकार भगवान अवश्य सुनते हैं। अहंकार छोड़कर शरण में जाना ही मुक्ति है।

ℹ️ ये कथाएँ लोक-परंपरा पर आधारित हैं और आस्था व सांस्कृतिक पठन हेतु प्रस्तुत हैं।
⚠️ केवल आस्था व जानकारी हेतु — वैज्ञानिक या पेशेवर सलाह नहीं। विवरण