ध्रुव की कथा
अटल भक्ति से ध्रुव तारा बनने की कहानी
राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं — सुनीति और सुरुचि। सुनीति का पुत्र था ध्रुव और सुरुचि का उत्तम। राजा को सुरुचि अधिक प्रिय थी।
एक दिन बालक ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठना चाहता था, पर सौतेली माँ सुरुचि ने उसे रोक दिया और ताना मारा — 'राजा की गोद में बैठना है तो भगवान से प्रार्थना कर कि अगले जन्म में मेरी कोख से जन्म ले।' छोटे ध्रुव का हृदय यह सुनकर भर आया।
वह रोता हुआ अपनी माँ सुनीति के पास गया। माँ ने समझाया — 'बेटा, दुखी मत हो। जिसकी गोद सबसे ऊँची है, उस भगवान विष्णु की शरण में जा। वही सच्चा सहारा है।' पाँच वर्ष का ध्रुव यह बात गाँठ बाँधकर वन की ओर चल पड़ा।
वन में उसे नारद मुनि मिले। उन्होंने बालक की दृढ़ता देखकर उसे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र दिया। ध्रुव ने घोर तपस्या आरंभ कर दी — भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी सब भूलकर वह एकाग्र मन से भगवान का स्मरण करता रहा।
बालक की इस अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए। ध्रुव की भक्ति देख वे अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे वरदान दिया — 'तुम्हें ऐसा अटल स्थान मिलेगा जहाँ से तुम कभी नहीं हटोगे। सब तारे और ग्रह तुम्हारी परिक्रमा करेंगे।'
इस तरह बालक ध्रुव आकाश में अटल 'ध्रुव तारा' बन गया, जो आज भी उत्तर दिशा में अचल खड़ा है और सब तारे उसके चारों ओर घूमते हैं। उसकी भक्ति अमर हो गई।
सच्ची लगन और दृढ़ संकल्प के आगे आयु, धन या पद कोई बाधा नहीं। मन में ठान लो तो ईश्वर भी मिल जाते हैं।