राम नवमी कथा
भगवान श्रीराम के जन्म की कहानी
त्रेता युग की बात है। अयोध्या के राजा दशरथ धर्मात्मा और प्रजावत्सल थे, पर बहुत समय तक उनके कोई संतान न हुई, जिससे वे चिंतित रहते थे। राजगुरु वशिष्ठ की सलाह पर राजा दशरथ ने 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' कराया।
यज्ञ की पूर्णाहुति पर अग्निदेव स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने राजा दशरथ को खीर से भरा एक दिव्य पात्र दिया और कहा — 'यह प्रसाद अपनी रानियों को खिलाओ, इससे तुम्हें तेजस्वी पुत्र प्राप्त होंगे।' राजा दशरथ ने वह खीर अपनी तीनों रानियों — कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा — में बाँट दी।
समय आने पर चैत्र शुक्ल नवमी के दिन, दोपहर के शुभ मुहूर्त में, माता कौशल्या के गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया। उसी समय कैकेयी से भरत, और सुमित्रा से लक्ष्मण व शत्रुघ्न का जन्म हुआ। पूरी अयोध्या आनंद से झूम उठी, घर-घर उत्सव मनाया गया।
भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए — अर्थात् मर्यादा (आदर्श आचरण) के सर्वोत्तम पुरुष। उन्होंने पिता के वचन के लिए राजपाट छोड़कर चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया, रावण जैसे अहंकारी का वध किया, और एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति व आदर्श राजा के रूप में पूरे संसार के लिए उदाहरण बने। उनका राज्य 'राम-राज्य' आज भी सुशासन का प्रतीक माना जाता है।
तभी से चैत्र शुक्ल नवमी को राम नवमी के रूप में मनाया जाता है। भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, रामायण व रामचरितमानस का पाठ करते हैं, दोपहर में राम-जन्म का उत्सव मनाते हैं और 'श्री राम जय राम जय जय राम' का जाप करते हैं।
मर्यादा, सत्य और कर्तव्य का पालन ही सच्चा धर्म है। श्रीराम का जीवन हमें आदर्श आचरण की प्रेरणा देता है।