हरतालिका तीज व्रत कथा
माता पार्वती की कठोर तपस्या की कहानी
बहुत पुरानी कथा है। हिमालय राज की पुत्री पार्वती ने मन ही मन भगवान शिव को अपना पति मान लिया था। वे चाहती थीं कि शिवजी ही उनके स्वामी बनें। इसके लिए उन्होंने घोर तपस्या आरंभ कर दी — अन्न-जल त्यागकर, धूप-वर्षा और सर्दी सहकर, वे वर्षों तक केवल शिव का स्मरण करती रहीं।
इधर पार्वती के पिता उनकी चिंता करने लगे और उनका विवाह भगवान विष्णु से तय करने का विचार करने लगे। जब पार्वती को यह बात पता चली तो वे बहुत व्याकुल हुईं, क्योंकि उन्होंने तो शिवजी को अपना सब कुछ मान लिया था।
अपनी एक सखी की सहायता से पार्वती घर छोड़कर घने वन में चली गईं — इसी कारण इस व्रत का नाम 'हरतालिका' पड़ा (हरत = हरण/ले जाना, आलिका = सखी)। वन में जाकर उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाया और निर्जल रहकर कठोर तप किया। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन उन्होंने दिन-रात जागकर शिवजी का पूजन किया।
पार्वती की इस अटूट लगन, त्याग और तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हो गए। उन्होंने प्रकट होकर पार्वती को वरदान दिया कि वे ही उनकी पत्नी होंगी। आगे चलकर शिव-पार्वती का विवाह हुआ और वे आदर्श दंपति के रूप में पूजे गए।
तभी से कुँवारी कन्याएँ अच्छे वर की कामना से और सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु तथा अखंड सौभाग्य के लिए हरतालिका तीज का निर्जल व्रत रखती हैं। इस दिन रेत या मिट्टी से शिव-पार्वती बनाकर रातभर जागरण कर पूजन किया जाता है।
सच्ची लगन, धैर्य और तप के आगे बड़े से बड़ा लक्ष्य भी झुक जाता है। मन की सच्चाई सबसे बड़ी शक्ति है।