छठ पूजा कथा
सूर्य देव व छठी मैया की उपासना की कहानी
छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया (षष्ठी देवी) की उपासना का सबसे कठिन और पवित्र व्रत है। यह मुख्यतः संतान की लंबी आयु, परिवार के सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है।
इससे जुड़ी एक कथा महाभारत काल की है। मान्यता है कि जब पांडव अपना राजपाट जुए में हार गए और संकट में पड़ गए, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखकर सूर्य देव की आराधना की। सूर्य देव की कृपा से पांडवों के कष्ट दूर हुए और उन्हें अपना खोया राजपाट पुनः प्राप्त हुआ।
एक अन्य कथा राजा प्रियव्रत की है। राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी को बहुत समय तक संतान नहीं हुई। महर्षि कश्यप ने यज्ञ कराया, जिससे रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, पर वह मृत पैदा हुआ। राजा-रानी शोक में डूब गए। तभी आकाश से देवी षष्ठी (छठी मैया) प्रकट हुईं और बोलीं — 'मैं सृष्टि की रक्षा करने वाली षष्ठी देवी हूँ। जो मेरी सच्चे मन से पूजा करेगा, उसे संतान-सुख मिलेगा।' देवी की कृपा से वह मृत बालक जीवित हो उठा। तभी से छठी मैया की पूजा का विधान चला।
छठ का व्रत बहुत कठिन होता है — व्रती (अधिकतर महिलाएँ) लगभग छत्तीस घंटे का निर्जल उपवास रखती हैं। पहले दिन 'नहाय-खाय', दूसरे दिन 'खरना', तीसरे दिन संध्या को डूबते सूर्य को अर्घ्य, और चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पूरा होता है। यह संसार का संभवतः एकमात्र पर्व है जहाँ डूबते सूर्य की भी पूजा होती है — यह सिखाता है कि हर ढलान के बाद फिर उदय निश्चित है।
नदी या तालाब के किनारे, जल में खड़े होकर, सूर्य को अर्घ्य देती महिलाओं का दृश्य श्रद्धा और स्वच्छता का अद्भुत संगम होता है।
सूर्य ही जीवन का आधार है — उगते और ढलते, दोनों रूपों का आदर करना चाहिए। कठिन तप और शुद्ध श्रद्धा से हर मनोकामना पूरी होती है।