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अक्षय तृतीया कथा

अक्षय फल देने वाले शुभ दिन व धर्मदास की कहानी

📅 वैशाख मास, शुक्ल पक्ष तृतीया 🙏 दान, पूजन व नए कार्य आरंभ के लिए सर्वश्रेष्ठ शुभ दिन; सोना खरीदना शुभ माना जाता है।

अक्षय तृतीया को 'अखा तीज' भी कहते हैं। 'अक्षय' का अर्थ है — जिसका कभी क्षय (नाश) न हो। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, पूजन और शुभ कार्य अक्षय फल देता है, जो कभी समाप्त नहीं होता। इसीलिए यह दिन बिना किसी मुहूर्त देखे शुभ कार्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

इससे जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा धर्मदास नामक एक गरीब किंतु धर्मात्मा व्यक्ति की है। धर्मदास निर्धन था, पर उसका मन बहुत उदार और श्रद्धालु था। एक बार उसने अक्षय तृतीया के महत्व के बारे में सुना कि इस दिन किया दान अक्षय फल देता है।

धर्मदास ने अपनी गरीबी की परवाह किए बिना, इस दिन गंगा स्नान किया और जो कुछ थोड़ा-बहुत उसके पास था — जल से भरे घड़े, सत्तू, चावल, गुड़, वस्त्र — सब श्रद्धा से ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान कर दिया। उसकी पत्नी ने टोका भी कि घर में खाने को कम है, पर धर्मदास ने कहा — 'दान से धन घटता नहीं, बढ़ता है। और अक्षय तृतीया का दान तो अक्षय फल देता है।'

धर्मदास हर वर्ष अक्षय तृतीया पर यही करता रहा — सच्चे मन से, बिना किसी लालच के दान करता रहा। उसके इस निःस्वार्थ दान और श्रद्धा का फल यह हुआ कि अगले जन्म में वह एक धर्मात्मा, समृद्ध और प्रतापी राजा बना, जिसके पास धन-धान्य की कोई कमी न थी। उसका पुण्य सचमुच 'अक्षय' हो गया।

एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु के परशुराम अवतार का जन्म हुआ था, और इसी दिन माँ गंगा का धरती पर अवतरण भी हुआ। महाभारत में इसी दिन भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को 'अक्षय पात्र' दिया था, जिसका भोजन कभी समाप्त नहीं होता था।

तभी से अक्षय तृतीया पर दान, पूजन, गंगा स्नान, और नए कार्य (विवाह, गृह-प्रवेश, व्यापार आरंभ) करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन सोना-चाँदी खरीदना भी समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

🌼 सीख

सच्चे मन से किया गया दान कभी व्यर्थ नहीं जाता — वह अक्षय फल देता है। देने से धन घटता नहीं, पुण्य बढ़ता है।

ℹ️ ये कथाएँ लोक-परंपरा पर आधारित हैं और आस्था व सांस्कृतिक पठन हेतु प्रस्तुत हैं।
⚠️ केवल आस्था व जानकारी हेतु — वैज्ञानिक या पेशेवर सलाह नहीं। विवरण