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संतोषी माता व्रत कथा

शुक्रवार व्रत व बहू की श्रद्धा की कहानी

📅 शुक्रवार (सोलह शुक्रवार तक व्रत) 🙏 महिलाएँ सुख, संतोष व मनोकामना पूर्ति हेतु संतोषी माता का व्रत रखती हैं।

एक नगर में एक बुढ़िया के सात बेटे थे। छह कमाते थे और एक निकम्मा माना जाता था। बुढ़िया छहों कमाने वालों को अच्छा भोजन देती और सातवें को बचा-खुचा। भोली बहू (सातवें की पत्नी) यह सब चुपचाप सहती रहती।

एक दिन छोटे बेटे को यह बात पता चली कि उसके साथ घर में भेदभाव होता है। दुखी होकर वह परदेस कमाने चला गया और बहू से बोला — 'मैं धन कमाकर लौटूँगा।' जाते समय वह बहू को कोई निशानी न दे सका। पीछे बहू पर घर में और भी अत्याचार बढ़ गए, उसे कठिन काम और रूखा-सूखा भोजन मिलता।

दुखी बहू एक दिन मंदिर गई, जहाँ कुछ स्त्रियाँ संतोषी माता का व्रत कर रही थीं। बहू ने उनसे व्रत की विधि पूछी। उन्होंने बताया — 'हर शुक्रवार संतोषी माता का व्रत रखो, गुड़ और चने का भोग लगाओ, और इस दिन खट्टी चीज़ न खाओ और न किसी को दो। सच्चे मन से माता का स्मरण करो, तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी।'

बहू ने श्रद्धा से शुक्रवार का व्रत आरंभ कर दिया। उसने माता से प्रार्थना की कि उसका पति कुशल लौट आए। संतोषी माता उसकी सच्ची भक्ति और संतोष से प्रसन्न हुईं। थोड़े ही समय में परदेस गया पति खूब धन कमाकर सकुशल घर लौट आया और बहू के दिन फिर गए।

बहू ने व्रत के उद्यापन (समापन) में बच्चों को भोजन कराया। पर किसी ने शरारत से खटाई (खट्टी चीज़) खिला दी, जिससे माता रुष्ट हो गईं और फिर से संकट आने लगा। तब बहू ने क्षमा माँगकर पूरे नियम से उद्यापन किया, खटाई से पूरी तरह परहेज़ रखा। संतोषी माता पुनः प्रसन्न हो गईं और परिवार सुख-समृद्धि से भर गया।

तभी से महिलाएँ सोलह शुक्रवार संतोषी माता का व्रत रखती हैं, गुड़-चने का भोग लगाती हैं, खटाई से परहेज़ करती हैं और संतोष व सुख की कामना करती हैं।

🌼 Seekh (Moral)

संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। श्रद्धा और नियम से किया व्रत, और मन में संतोष — हर मनोकामना पूरी कर देता है।

ℹ️ These stories are based on folk tradition and are shared for faith and cultural reading.
⚠️ For faith & interest only — not scientific or professional advice. Details