नवरात्रि व माँ दुर्गा कथा
महिषासुर वध व नौ देवियों की कहानी
बहुत समय पहले महिषासुर नाम का एक भयंकर राक्षस था, जो भैंसे का रूप धारण कर सकता था। उसने कठोर तप करके वरदान पा लिया था कि उसे कोई देव, दानव या पुरुष नहीं मार सकेगा। इस वरदान के घमंड में उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया, देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ दिया और स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने लगा।
सभी देवता परेशान होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुँचे। तब तीनों देवों सहित सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं — माँ दुर्गा। सबने उन्हें अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिए — त्रिशूल, चक्र, गदा, धनुष-बाण, तलवार। सिंह उनका वाहन बना। माँ दुर्गा का तेजोमय रूप देखकर सृष्टि जगमगा उठी।
माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच भीषण युद्ध हुआ, जो नौ दिन और नौ रात तक चला। महिषासुर बार-बार अपना रूप बदलता रहा — कभी भैंसा, कभी सिंह, कभी मनुष्य। अंत में नवमी की रात माँ दुर्गा ने अपने त्रिशूल से महिषासुर का वध कर दिया। इसी कारण माँ दुर्गा को 'महिषासुरमर्दिनी' कहा जाता है। चूँकि उसे कोई देव-दानव-पुरुष नहीं मार सकता था, इसलिए देवी (स्त्री-शक्ति) ने उसका अंत किया।
इन्हीं नौ दिनों की याद में नवरात्रि मनाई जाती है। हर दिन माँ के एक रूप का पूजन होता है — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। भक्त नौ दिन व्रत रखते हैं, माँ की आराधना करते हैं, कन्या-पूजन करते हैं, और दसवें दिन विजयादशमी मनाते हैं।
नवरात्रि स्त्री-शक्ति, साहस और बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है।
नारी-शक्ति सृष्टि की सबसे बड़ी शक्ति है। अहंकारी और अत्याचारी का अंत निश्चित है — चाहे वह कितना भी बलवान क्यों न हो।