मकर संक्रांति कथा
सूर्य देव का मकर राशि में प्रवेश व शनि से मिलन
मकर संक्रांति वह दिन है जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और 'उत्तरायण' का आरंभ होता है। इस दिन से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं, और प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है।
इससे जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा सूर्य देव और उनके पुत्र शनि देव की है। पौराणिक मान्यता के अनुसार शनि देव सूर्य के पुत्र हैं, पर किसी कारणवश पिता-पुत्र के बीच मनमुटाव रहता था। शनि की राशि मकर है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव स्वयं अपने पुत्र शनि के घर (मकर राशि) में आते हैं। इस तरह यह दिन पिता-पुत्र के मिलन और आपसी कड़वाहट दूर कर स्नेह स्थापित करने का प्रतीक माना जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर पृथ्वी पर सुख-शांति की स्थापना की थी, इसलिए इसे बुराई के अंत और अच्छाई के आरंभ का दिन भी माना जाता है। महाभारत में भीष्म पितामह ने भी अपने प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण (मकर संक्रांति के बाद) का ही समय चुना था, क्योंकि इस काल में देह त्यागने वाले को मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है।
इस दिन लोग पवित्र नदियों — विशेषकर गंगा — में स्नान करते हैं, सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं, और तिल-गुड़ का दान व सेवन करते हैं। 'तिल-गुड़ घ्या, गोड़-गोड़ बोला' — यानी तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो — यह भाव आपसी कड़वाहट मिटाकर मिठास बढ़ाने का है। पतंगबाजी भी इस पर्व की पहचान है, जो खुले आसमान में उड़ान और उल्लास का प्रतीक है।
जीवन में रिश्तों की कड़वाहट मिटाकर मिठास घोलनी चाहिए। अँधकार के बाद प्रकाश और ठहराव के बाद गति निश्चित है।