← All Kathayein
📖

गुरु पूर्णिमा कथा

महर्षि वेदव्यास व गुरु-महिमा की कहानी

📅 आषाढ़ मास, पूर्णिमा 🙏 शिष्य अपने गुरु का पूजन कर ज्ञान व मार्गदर्शन के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति आदर, श्रद्धा और आभार व्यक्त करने का पवित्र पर्व है। 'गु' का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' का अर्थ है उसे दूर करने वाला प्रकाश। अर्थात् जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश दे, वही गुरु है।

इस दिन को 'व्यास पूर्णिमा' भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास वे महान ऋषि थे जिन्होंने चारों वेदों का विभाजन किया, अठारह पुराणों की रचना की, और महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना की, जिसमें भगवद्गीता का अमर ज्ञान समाहित है। उन्होंने मानवता को ज्ञान का अथाह भंडार दिया, इसलिए उन्हें आदिगुरु (प्रथम गुरु) माना जाता है।

भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊँचा माना गया है, क्योंकि गुरु ही वह मार्ग दिखाता है जिससे भगवान तक पहुँचा जा सकता है। एक प्रसिद्ध श्लोक है — 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः' — अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं, गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं, ऐसे गुरु को नमन।

प्राचीन काल में शिष्य गुरुकुल में रहकर गुरु से विद्या ग्रहण करते थे। गुरु न केवल शास्त्र-ज्ञान देते, बल्कि जीवन जीने की कला, धर्म, संस्कार और सही-गलत का बोध भी कराते। एकलव्य ने तो गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाकर ही धनुर्विद्या सीख ली थी — यह गुरु के प्रति समर्पण की पराकाष्ठा थी।

तभी से आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। इस दिन शिष्य अपने गुरुओं — चाहे वे शिक्षा के गुरु हों, आध्यात्मिक गुरु हों, या जीवन में मार्गदर्शन देने वाले बड़े-बुजुर्ग — का पूजन कर, उनके चरण छूकर, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

🌼 Seekh (Moral)

गुरु ही जीवन के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश देते हैं। गुरु और बड़ों का आदर सदा करना चाहिए — यही संस्कार की नींव है।

ℹ️ These stories are based on folk tradition and are shared for faith and cultural reading.
⚠️ For faith & interest only — not scientific or professional advice. Details