बसंत पंचमी व सरस्वती कथा
ज्ञान की देवी माँ सरस्वती के प्राकट्य की कहानी
बसंत पंचमी ज्ञान, विद्या, संगीत और कला की देवी माँ सरस्वती के प्राकट्य का पर्व है, और यह ऋतुराज बसंत के आगमन का भी प्रतीक है।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने संसार की रचना की, तो उन्होंने देखा कि चारों ओर सब कुछ शांत, नीरस और मौन है — न कोई वाणी, न संगीत, न ज्ञान का प्रकाश। सृष्टि सुनी-सुनी और बेजान लग रही थी। ब्रह्मा जी चिंतित हुए।
तब उन्होंने भगवान विष्णु की आज्ञा से अपने कमंडल से जल छिड़का। उस जल से एक अद्भुत तेजोमय देवी प्रकट हुईं — श्वेत वस्त्र धारण किए, हाथों में वीणा, पुस्तक और माला लिए, कमल पर विराजमान। यही थीं माँ सरस्वती।
जैसे ही देवी ने अपनी वीणा के तार छेड़े, सारी सृष्टि में मधुर ध्वनि गूँज उठी। पशु-पक्षियों को वाणी मिली, हवाओं में सरसराहट आई, जल कलकल बहने लगा, और संसार में ज्ञान, संगीत व वाणी का संचार हुआ। इसीलिए माँ सरस्वती को 'वाणी की देवी' और 'ज्ञान की देवी' कहा गया।
यह दिन माघ शुक्ल पंचमी था, इसलिए बसंत पंचमी को सरस्वती प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को विद्या आरंभ के लिए सबसे शुभ माना जाता है — छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर लिखवाए जाते हैं (अक्षर-आरंभ/विद्या-आरंभ)।
इस दिन पीले वस्त्र पहने जाते हैं, पीले फूल व पीले पकवान चढ़ाए जाते हैं, क्योंकि पीला रंग बसंत, ज्ञान और उल्लास का प्रतीक है। विद्यार्थी और कलाकार माँ सरस्वती की विशेष पूजा कर बुद्धि व कला का वरदान माँगते हैं।
ज्ञान और विद्या ही जीवन का सच्चा प्रकाश है। बिना ज्ञान के संसार नीरस है — इसलिए विद्या का सदा आदर करना चाहिए।