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वट सावित्री व्रत कथा

सावित्री द्वारा यमराज से पति को वापस लाने की कहानी

📅 ज्येष्ठ मास, अमावस्या (कहीं-कहीं पूर्णिमा) 🙏 सुहागिनें पति की दीर्घायु व अखंड सौभाग्य के लिए वट (बरगद) वृक्ष की पूजा कर यह व्रत रखती हैं।

प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति की एक तेजस्विनी पुत्री थी — सावित्री। बड़ी होने पर सावित्री ने स्वयं अपने लिए वर चुना — सत्यवान, जो वन में रहने वाले एक राजा के पुत्र थे, गुणवान और धर्मात्मा। पर एक ऋषि ने बताया कि सत्यवान अल्पायु है और विवाह के एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु निश्चित है।

यह जानकर भी सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं। उन्होंने कहा — 'मैंने मन से सत्यवान को पति मान लिया है, अब कोई और मेरा वर नहीं हो सकता।' विवाह हुआ और सावित्री सत्यवान के साथ वन में रहने लगीं, सेवा-धर्म निभाती रहीं।

जिस दिन सत्यवान की मृत्यु का समय आया, सावित्री व्रत रखकर उसके साथ वन में गईं। सत्यवान लकड़ी काटते-काटते अचानक मूर्छित होकर गिर पड़ा। तभी यमराज स्वयं उसके प्राण लेने आ पहुँचे। यमराज प्राण लेकर चल पड़े, पर सावित्री भी पीछे-पीछे चलती रहीं।

यमराज ने कई बार लौट जाने को कहा, पर सावित्री ने धर्म और पतिव्रत की ऐसी बातें कहीं कि यमराज प्रसन्न हो गए। उन्होंने वरदान माँगने को कहा — पर हर बार सावित्री ने बुद्धिमानी से ऐसे वरदान माँगे (जैसे सास-ससुर की आँखों की रोशनी, ससुर का राज्य, अपने लिए संतान) कि अंततः सत्यवान को जीवित किए बिना वे वरदान पूरे ही नहीं हो सकते थे।

सावित्री की बुद्धि, धर्मनिष्ठा और अटूट प्रेम के आगे यमराज को झुकना पड़ा और उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए। सावित्री ने यह सब वट (बरगद) वृक्ष के नीचे संभव किया, इसीलिए इस व्रत में वट वृक्ष की पूजा की जाती है।

तभी से सुहागिनें वट सावित्री व्रत रखती हैं, बरगद के वृक्ष की परिक्रमा कर कच्चा सूत लपेटती हैं और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।

🌼 Seekh (Moral)

बुद्धि, धैर्य और सच्चे प्रेम से मृत्यु जैसी कठिनाई का सामना भी किया जा सकता है। धर्म पर अडिग रहना ही सच्ची शक्ति है।

ℹ️ These stories are based on folk tradition and are shared for faith and cultural reading.
⚠️ For faith & interest only — not scientific or professional advice. Details