महाशिवरात्रि कथा
शिव-पार्वती विवाह व शिकारी की कहानी
महाशिवरात्रि से कई कथाएँ जुड़ी हैं। एक मान्यता के अनुसार इसी रात भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। माता पार्वती ने कठोर तप करके शिवजी को पति रूप में पाया, और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात उनका मंगल विवाह संपन्न हुआ। इसीलिए कुँवारी कन्याएँ अच्छे वर की कामना से और सुहागिनें सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं।
एक और प्रसिद्ध कथा एक गरीब शिकारी की है। एक बार एक शिकारी जंगल में शिकार खोजते-खोजते रात हो जाने पर एक बेल (बिल्व) के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया, ताकि किसी हिंसक पशु से बच सके। उस पेड़ के नीचे संयोग से एक शिवलिंग था, जो पत्तों में छिपा था।
रातभर जागते हुए, नींद न आए इसलिए शिकारी अनजाने में बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे गिराता रहा — और वे सब बेलपत्र ठीक उस शिवलिंग पर गिरते रहे। इस तरह बिना जाने ही उससे रातभर शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ते रहे और वह जागरण भी करता रहा — जो महाशिवरात्रि की पूजा का सबसे प्रिय रूप है।
भूख-प्यास से व्रत (अनजाने में उपवास), रातभर जागरण, और शिवलिंग पर बेलपत्र — यह सब अनजाने में ही सही, पर सच्चे मन से हुआ। भगवान शिव उस शिकारी पर प्रसन्न हो गए और उसके सारे पाप क्षमा कर उसे मुक्ति प्रदान की।
इस कथा का भाव यह है कि भगवान शिव भोलेनाथ हैं — वे भाव के भूखे हैं, दिखावे के नहीं। सच्ची श्रद्धा से चढ़ाया एक बेलपत्र भी उन्हें प्रसन्न कर देता है।
तभी से महाशिवरात्रि की रात भक्त उपवास रखते हैं, रातभर जागरण करते हैं, शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाते हैं और 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते हैं।
भगवान शिव भाव के भूखे हैं, आडंबर के नहीं। सच्ची श्रद्धा से किया छोटा सा अर्पण भी मुक्ति दिला सकता है।