गोवर्धन पूजा व गौ-कथा
श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की कहानी
बात द्वापर युग की है, जब श्रीकृष्ण गोकुल-वृंदावन में ग्वाल-बालों के साथ खेला करते थे। वहाँ के लोग हर वर्ष इंद्र देव की पूजा बड़े धूमधाम से करते थे, यह सोचकर कि इंद्र ही वर्षा भेजते हैं जिससे खेती और चारा होता है।
एक बार बाल कृष्ण ने अपने पिता नंदबाबा और गाँव वालों से पूछा — 'हम इंद्र की पूजा क्यों करते हैं?' लोगों ने कहा — 'इंद्र वर्षा करते हैं, उसी से अन्न और घास उगती है, हमारी गायें पलती हैं।' तब कृष्ण बोले — 'वर्षा तो प्रकृति का नियम है। हमें असल में जो हर दिन पालता है, वह है यह गोवर्धन पर्वत — जिसकी घास से हमारी गायें भरपेट चरती हैं, और यही गायें हमें दूध-घी देती हैं। इसलिए हमें गोवर्धन और गौ-माता की पूजा करनी चाहिए।'
गाँव वालों को बात जँच गई। उन्होंने उस वर्ष इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा की, छप्पन भोग लगाया और परिक्रमा की। यह देखकर इंद्र को अहंकार आ गया और क्रोध भी। उन्होंने मूसलधार वर्षा शुरू कर दी — ऐसी प्रलय जैसी बारिश कि गोकुल डूबने लगा। लोग, बच्चे और गायें भयभीत होकर कृष्ण के पास दौड़े।
तब श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर अपनी कनिष्ठा (सबसे छोटी) उँगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया, मानो वह कोई छाता हो। पूरे सात दिन और सात रात गाँव के सब लोग, बच्चे और गायें उस पर्वत के नीचे सुरक्षित खड़े रहे। एक बूँद भी उन पर नहीं पड़ी।
जब इंद्र का सारा बल हार गया और उन्हें अपनी भूल समझ आई, तो वर्षा रुक गई। इंद्र ने आकर श्रीकृष्ण से क्षमा माँगी और उनकी महिमा को प्रणाम किया। तब से कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा की जाती है — घर के आँगन में गोबर से गोवर्धन बनाकर, अन्नकूट का भोग लगाकर, और गौ-माता की पूजा करके।
इसी दिन गायों को नहलाया जाता है, उन्हें सजाया जाता है, और गौ-ग्रास (गाय को रोटी-चारा) खिलाकर उनका आभार माना जाता है — क्योंकि गौ-माता को हमारी संस्कृति में माता का दर्जा दिया गया है।
जो हमें सचमुच पालता है — प्रकृति, गौ-माता और परिश्रम — उसका आदर और आभार करना ही सच्ची पूजा है। अहंकार सदा झुकता है।