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राजा हरिश्चंद्र

सत्य के लिए राजपाट, पत्नी-पुत्र सब त्यागने वाले सत्यवादी राजा की कथा

राजा हरिश्चंद्र अपने सत्य और वचन-पालन के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। उनकी परीक्षा लेने के लिए ऋषि विश्वामित्र ने एक स्वप्न में उनसे पूरा राज्य दान में माँग लिया। जागने पर हरिश्चंद्र ने स्वप्न के वचन को भी सत्य मानकर अपना सारा राज्य विश्वामित्र को सौंप दिया।

पर विश्वामित्र यहीं नहीं रुके — उन्होंने दक्षिणा भी माँगी। राज्य तो जा ही चुका था, दक्षिणा चुकाने के लिए हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी शैव्या और पुत्र रोहिताश्व को बेच दिया, और स्वयं को एक चांडाल के हाथ बेच दिया जो श्मशान का रखवाला था। राजा अब श्मशान में दाह-संस्कार का कर वसूलने लगा।

समय ने क्रूर मोड़ लिया। एक दिन उनका पुत्र रोहिताश्व सर्पदंश से मर गया। दुखी माता शैव्या रात में पुत्र का शव लेकर उसी श्मशान पहुँची जहाँ हरिश्चंद्र कर वसूलते थे। अँधेरे में दोनों एक-दूसरे को पहचान न सके। जब पहचाना, तो हृदय फट गया — पर सत्य पर अडिग हरिश्चंद्र ने कहा — 'मैं अपने स्वामी का सेवक हूँ। बिना कर लिए शव का संस्कार नहीं कर सकता, चाहे यह मेरा अपना पुत्र ही क्यों न हो।'

शैव्या के पास देने को कुछ न था, उसने अपनी साड़ी का आधा भाग कर के रूप में देने को फाड़ा। उसी क्षण देवता प्रकट हो गए। यह सब विश्वामित्र की परीक्षा थी। हरिश्चंद्र सत्य की हर कठिन परीक्षा में खरे उतरे थे।

देवताओं ने रोहिताश्व को जीवित कर दिया, हरिश्चंद्र को उनका राज्य लौटा दिया गया, और उनकी कीर्ति अमर हो गई। तब से 'सत्यवादी हरिश्चंद्र' सत्यनिष्ठा का सबसे बड़ा प्रतीक बन गए।

🌼 Seekh (Moral)

सत्य पर अडिग रहना सबसे बड़ा धर्म है। सच्चाई के लिए दी गई परीक्षा अंततः विजय दिलाती है।

ℹ️ These stories are based on folk tradition and are shared for faith and cultural reading.
⚠️ For faith & interest only — not scientific or professional advice. Details