भगीरथ और गंगा अवतरण
अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को धरती पर लाने वाले भगीरथ की कथा
राजा सगर के साठ हजार पुत्र एक यज्ञ के घोड़े की खोज में कपिल मुनि के आश्रम पहुँचे और उन पर चोरी का झूठा आरोप लगाया। तपस्या में लीन कपिल मुनि की क्रोधाग्नि से वे सभी भस्म हो गए। उनकी आत्माओं को मुक्ति तभी मिल सकती थी जब स्वर्ग की पवित्र गंगा धरती पर आकर उनकी राख को स्पर्श करे।
सगर के वंशजों ने पीढ़ियों तक प्रयास किया, पर सफल न हुए। अंततः राजा भगीरथ ने यह प्रण लिया कि वे गंगा को धरती पर अवश्य लाएँगे। उन्होंने राजपाट छोड़कर हिमालय में जाकर हजारों वर्ष घोर तपस्या की।
भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा प्रकट हुईं, पर बोलीं — 'मेरा वेग इतना प्रचंड है कि यदि मैं सीधे स्वर्ग से धरती पर गिरी, तो पूरी पृथ्वी बह जाएगी। मेरे वेग को कोई धारण कर सके, तब ही मैं उतर सकती हूँ।'
भगीरथ ने फिर भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिवजी प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने का वचन दिया। जब गंगा अहंकार के साथ प्रचंड वेग से उतरीं, शिवजी ने उन्हें अपनी विशाल जटाओं में समेट लिया। गंगा का अभिमान टूट गया।
फिर शिवजी ने गंगा की एक धारा को धीरे से छोड़ा, और भगीरथ आगे-आगे चलते रहे, गंगा उनके पीछे-पीछे बहती रही। इस तरह गंगा भगीरथ के पीछे चलकर उस स्थान पहुँचीं जहाँ सगर-पुत्रों की राख थी। गंगा के पवित्र स्पर्श से उन सबका उद्धार हो गया।
भगीरथ के इसी अथक प्रयास के कारण गंगा को 'भागीरथी' भी कहा जाता है, और किसी भी कठिन, असंभव-से कार्य के लिए किए गए महान प्रयास को आज भी 'भगीरथ प्रयास' कहा जाता है।
दृढ़ संकल्प और कठोर तप से असंभव भी संभव हो जाता है। इसीलिए कठिन प्रयास को भगीरथ प्रयास कहते हैं।